“स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा”
निलेश बताते हैं कि जब भारत अंग्रेजों के अधीन था, तब लोगों के मन में डर और असहायता का भाव था। ऐसे समय में तिलक जी ने अपने विचारों और लेखों के माध्यम से जनता को जागरूक किया। निलेश के अनुसार, उन्होंने ‘केसरी’ और ‘मराठा’ जैसे समाचार पत्रों के जरिए अंग्रेजी शासन की नीतियों का खुलकर विरोध किया और लोगों को अपने अधिकारों के लिए खड़ा होने की प्रेरणा दी।
निलेश कहते हैं कि तिलक जी ने सार्वजनिक गणेश उत्सव और शिवाजी जयंती की शुरुआत कर समाज में एकता और राष्ट्रीय भावना को मजबूत किया। इन आयोजनों के माध्यम से उन्होंने लोगों को एक मंच पर लाकर देशभक्ति की भावना को बढ़ावा दिया। निलेश मानते हैं कि यह एक अनोखा तरीका था, जिससे आम जनता भी स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ने लगी।
निलेश के अनुसार, “स्वराज” का अर्थ केवल राजनीतिक आज़ादी नहीं था, बल्कि आत्मनिर्भरता और आत्मसम्मान भी था। तिलक जी चाहते थे कि हर भारतीय अपने अधिकारों को पहचाने और उन्हें पाने के लिए संघर्ष करे। यही कारण है कि उनका यह नारा आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उस समय था।
निलेश कहते हैं कि तिलक जी का जीवन संघर्ष और साहस की मिसाल है। उन्होंने कई बार जेल की सजा झेली, लेकिन कभी अपने सिद्धांतों से पीछे नहीं हटे। उनका विश्वास था कि अगर जनता एकजुट हो जाए, तो कोई भी ताकत उसे स्वतंत्रता प्राप्त करने से नहीं रोक सकती।
अंत में, निलेश कहते हैं कि लोकमान्य तिलक का यह संदेश हमें आज भी प्रेरित करता है कि हमें अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहना चाहिए और अन्याय के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए। उनका यह नारा भारतीय इतिहास में हमेशा गूंजता रहेगा और आने वाली पीढ़ियों को साहस और देशभक्ति की प्रेरणा देता रहेगा।
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