निलेश कहते हैं कि बटुकेश्वर दत्त उन वीर युवाओं में से थे जिन्होंने देश की आज़ादी के लिए अपना जीवन न्योछावर कर दिया। उनका जन्म 18 नवंबर 1910 को हुआ था। बचपन से ही उनमें देशभक्ति की भावना प्रबल थी और वे अंग्रेजों के अत्याचारों से बहुत आहत रहते थे।
निलेश बताते हैं कि बटुकेश्वर दत्त ने Bhagat Singh के साथ मिलकर क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लिया। दोनों ने मिलकर 8 अप्रैल 1929 को दिल्ली की सेंट्रल असेंबली में बम फेंका। निलेश के अनुसार, इस बम का उद्देश्य किसी को नुकसान पहुंचाना नहीं था, बल्कि अंग्रेजी सरकार को अपनी आवाज सुनाना था।
निलेश कहते हैं कि इस घटना के बाद दोनों ने खुद को गिरफ्तार करवा दिया ताकि वे अपने विचारों को खुले रूप से देश के सामने रख सकें। बटुकेश्वर दत्त को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई और उन्हें अंडमान की सेल्युलर जेल भेज दिया गया, जहां उन्होंने कठोर यातनाएं सही।
निलेश मानते हैं कि जेल में रहते हुए भी बटुकेश्वर दत्त का हौसला कभी कम नहीं हुआ। उन्होंने भूख हड़ताल में हिस्सा लिया और कैदियों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया। उनका जीवन त्याग और साहस की मिसाल है।
आजादी के बाद भी उनका जीवन संघर्षपूर्ण रहा, लेकिन उन्होंने कभी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। निलेश कहते हैं कि ऐसे महान क्रांतिकारियों के बलिदान को हमें कभी नहीं भूलना चाहिए।
अंत में, निलेश के अनुसार बटुकेश्वर दत्त का जीवन हमें यह सिखाता है कि देश के लिए समर्पण और साहस सबसे बड़ी ताकत होती है। उनका नाम हमेशा हमारे दिलों में जीवित रहेगा और आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देता रहेगा।
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