भारत में इच्छा मृत्यु (Euthanasia) को लेकर अस्पतालों और अदालतों में लगातार चर्चा बढ़ रही है। हाल ही में एक मामले में अस्पताल ने मरीज की लिविंग विल (Living Will) और मेडिकल बोर्ड की सलाह के आधार पर पैसिव इच्छा मृत्यु की प्रक्रिया शुरू की, जिससे पूरे देश में इस विषय पर बहस तेज हो गई।
Supreme Court of India के फैसलों के बाद भारत में पैसिव इच्छा मृत्यु कुछ शर्तों के साथ कानूनी रूप से मान्य है। इसका मतलब है कि अगर कोई मरीज लाइलाज बीमारी या लंबे समय से कोमा में है और ठीक होने की संभावना नहीं है, तो डॉक्टर और परिवार की सहमति से लाइफ-सपोर्ट सिस्टम हटाया जा सकता है।
अस्पताल में क्या हुआ
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, एक गंभीर रूप से बीमार मरीज लंबे समय से अस्पताल में वेंटिलेटर पर था। डॉक्टरों की टीम ने जांच के बाद बताया कि मरीज के ठीक होने की संभावना लगभग नहीं है। परिवार ने अस्पताल प्रशासन को बताया कि मरीज ने पहले ही लिविंग विल में लिखा था कि ऐसी स्थिति में उसे कृत्रिम जीवन-रक्षक उपकरणों पर लंबे समय तक न रखा जाए।
इसके बाद अस्पताल ने मेडिकल बोर्ड गठित किया। डॉक्टरों की समिति ने मरीज की स्थिति की जांच की और यह पुष्टि की कि बीमारी लाइलाज और अंतिम अवस्था में है। सभी कानूनी प्रक्रिया पूरी करने के बाद मरीज को लाइफ-सपोर्ट से हटाने की अनुमति दी गई।
इच्छा मृत्यु क्या होती है
इच्छा मृत्यु का अर्थ है कि किसी ऐसे व्यक्ति को सम्मानपूर्वक मृत्यु की अनुमति देना, जो असहनीय दर्द या लाइलाज बीमारी से जूझ रहा हो।
इसके दो प्रकार माने जाते हैं:
Active Euthanasia – दवा या इंजेक्शन देकर मृत्यु देना (भारत में गैर-कानूनी)।
Passive Euthanasia – जीवन-रक्षक उपचार या वेंटिलेटर हटाकर प्राकृतिक मृत्यु होने देना।
लिविंग विल की भूमिका
लिविंग विल एक ऐसा दस्तावेज़ है जिसमें व्यक्ति पहले से लिख देता है कि अगर वह भविष्य में कोमा या गंभीर बीमारी में हो और निर्णय लेने की स्थिति में न हो, तो डॉक्टर उसके इलाज को किस सीमा तक जारी रखें।
भारत में सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में लिविंग विल को मान्यता दी थी और बाद में इसकी प्रक्रिया को सरल बनाया गया। इसके बाद कई अस्पतालों ने एंड-ऑफ-लाइफ केयर के मामलों में इन नियमों का पालन करना शुरू किया।
समाज में बहस
इस मामले के सामने आने के बाद समाज में दो तरह की राय देखने को मिल रही है। कुछ लोग इसे मानवीय और सम्मानजनक निर्णय मानते हैं, जबकि कुछ का कहना है कि इसका दुरुपयोग रोकने के लिए कड़े नियम जरूरी हैं।
फिलहाल यह मामला भारत में मरीजों के अधिकार, चिकित्सा नैतिकता और कानून के बीच संतुलन की एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है।
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